मंगलवार, 26 मार्च 2013

  

नौका विहार

( एक घनाक्षरी छंद )

नीरव निशा में नीली यमुना के नीर तीर
करती नौका विहार , संग वृज रानी है  !!
नीले नीले अम्बर की नीलिमा निहारे नाथ
श्याम देत नील मणि , नेग की निशानी है !!
नूपुर पहिर नाथ , नाच  दिखरावत है
नैनन निहाल नैन , मारि मुस्कानी है !!
नैन ललचावै , दिखरावे नखरैल भाव
नन्द के नंदन को , चिढावे राधारानी है !!

---अनंत चैतन्य - लखनऊ ----

सोमवार, 25 मार्च 2013

 

 

काशीनाथ की होली

         ( एक घनाक्षरी छंद )
उमा संग काशीनाथ, होली खेले गंगा घाट
अंग में लगाये भस्म , भंग भी चढ़ाये है  !!
शमशान घाट बीच , शिवा संग बैठे शिव
भूत प्रेत नाचे सब , शिव    मुस्काये है   !!
रंग और भंग बीच , गंग भी तरंगित है
गणपति गणेशजी , ढुमका  लगाये है  !!
डमकावत   डमरू , बम बम महानाद
विश्वनाथ बाबा होली , टोली को खिलाये है !!
---अनंत चैतन्य - लखनऊ ----

गुरुवार, 7 मार्च 2013




( दो दिलों की कहानी, जो मिल न पाए --एक गीत में )

----तेरे सिवा कुछ याद न आये ,  घुप्प अँधेरे में  ----

नही पड़ा कभी प्रीत प्रेम के , किसी झमेले में !
पहली बार मिले थे उससे , नितांत अकेले में !!

याद हमें जब बैठे संग संग , घर खपरेले में  !
हम दोनों में नेह भाव था , ज्यो गुरु चेले में !!

देखी प्रेम की बहती नदिया , उस अलबेले में !
पता नही कब एक हुए दिल , प्रेम के खेले में !!

क्रम एह चलता रहा मिलन का , शाम सबेरे में !
हम दोनों फिर बिछड़ गए , रूढ़िवादी मेले में  !!

छोटा उसका हाथ साथ , उस भीड़ के रेले में !
कमल तभी कुम्भलाया उस , पोखर मटमैले में !!

आशाओं का किरण दिखे , हर दिन के उजेले में !
तेरे सिवा कुछ याद न आये ,  घुप्प अँधेरे में  !!

-- --अनंत चैतन्य - लखनऊ ---


गोपियों की चीर हरने वाले श्याम !!
तुम कब आओगे ?
मेरे भी वस्त्र चुराओगे ??
निशा रुपी सरोवर में
निद्रा स्नान करते समय
काम क्रोध मद लोभ में रगें, सिले मेरे कपडे
जो छिपा देता हूँ अपनी ही काया में
और सुबह नींद से बाहर आकर
अहंकारी अंगडाईयों के साथ
पहन लेता  हूँ हरदिन
उन्हें कब चुरावोगे ,
बोलो , तुम मेरे वस्त्र कब चुरावोगे
कब मुझे उस बाल रूप
वस्त्र विहीन 
मूल स्वरुप से मिलाओगे ,
हे घनश्याम !!
बोलो मेरे वस्त्र कब चुराओगे
चीर हरो घनश्याम ,  हमारी पीर हरो !!

-----अनंत चैतन्य - लखनऊ -----

मंगलवार, 19 फ़रवरी 2013

घनाक्षरी छंद
भगवान बुद्ध
करुणा के मीत , प्रीत प्रेम के पुजारी बुद्ध
बोधि बृक्ष छाया तलेज्ञान मिला जिनको  !!
शांति व् सौंदर्य सौम्य सभ्यता की शिक्षा देके
राजा भिक्षु बना ,दिया  ध्यान जन जनको !!
हिंसा से अहिंसा का पुजारी बन  अशोक ने भी
देशना     प्रचार हेतु      दान किया तन को !!
करुणा व् बोध की अवस्था देके मुक्त किया ,
दस्यु अंगुल मल ने छोड़ दिया बन को   !! 
----अनंत चैतन्य - लखनऊ -------


रौशनी की एक किरण को
बो दिया अंतःकरण में
वह बीज
बन गया है अब
चमकदार सूर्य
और जुड़ गया है
खुदा के नूर से .
अंतरतम के महाकाश में
वह महा प्रकाश
अलौकिक ऊर्जा लिए
प्रतिपल जगमगाता , झिलमिलाता
घट रहा है घट में
अनंत , चैतन्य पूर्ण जागरण
अब मुझे बाहर की रौशनी की क्या जरूरत
क्योकि
उसकी चमक में भटका हूँ जन्मो से
वाह्य चमक में सो गया था
हताश व् निराश ..
अब तो बस अंतर में
झर रहा है पुंज प्रकाश

----अनंत चैतन्य , लखनऊ ------

सोमवार, 31 दिसंबर 2012


((सद गुरु श्री    "अनंत श्री "  के जन्म दिवस  पर चरणों में एक पुष्पांजलि ))

मेरे अन्दर जब था तू
मधुबन के बसंत सा था तू
मन मंदिर में ध्यान लगाकर
देखा तो अनंत सा तू  !!

ह्रदय की गहराई में उतरा
पूनम के चन्द सा तू
साधक की आँखों से देखा
सद् गुरु , गुरु गोविंदा था तू  !!

अनहद नाद को सुना तो पाया
सुरों की सप्त लहरियों सा तू
उषा काल की ओस में झांका
निर्दोष चमकती लड़ियों सा तू  !!

पूर्व काल इतिहास को बांचा
महावीर बुद्धा सा तू
गिरि  कन्दरा गुफा में पाया
पूर्ण पुरुष सिद्धा सा था तू  !!

मन मस्तिष्क में घुस कर देखा
प्रखर पुंज प्रज्ञा सा तू
राज ऋषि  के अनुशासन का
ऐतिहासिक राजाज्ञा  था तू !!

यह  सब क्यों था
यह सब क्या था
तू जाने या खुदा जाने
 मै  तो बस इतना जानूं  कि ,
गूँगे के गुड़  जैसा था  तू  !!
मेरे अन्दर  जब जब था तू .......

---अनंत चैतन्य - लखनऊ ----