रविवार, 8 मई 2011

माँ जब जब तेरी याद आई. आँखे डबडबाई !!


माँ
माँ जब जब तेरी याद आई !
आँखे  डबडबाई  !!
                       तेरे हांथों से दुलराया जाना !
                       मेरे गालों को सहलाया जाना !
                       अपनी गोदी में चिपकाया जाना  !
                       रूठ जाएँ तो मनाया जाना !
                       थपकिया दे करके सुलाया जाना !
                      अपने आँचल में छिपाया जाना 
याद आते  ही यह बाते !
आजाती है रुलाई !!
                     गलतियाँ मेरी हो फिर भी 
                      मुझे निर्दोष बतलाना  !
                      जरा सी छींक आने पर ,
                      डॉक्टर से दवा लाना !
                      दूध न पीने पर 
                     चंदा मामा को बुला लाना !

तेरे बिन माँ , कितना अधूरा हूँ!
सोचा तो हूक उठ आई !!
                   तेरी यादें ही शेष है ,
                   स्मृतिया जो विशेष है !
                   धरोहर है यह मेरी ,
                   जिन्हें खोना नहीं चाहूँ !
                   तुझे तकलीफ न हो मां,
                   अतः रोना नहीं चाहूँ !
यह यादें खर्च न होंगी !
यही मेरी कमाई है !!

                  आज जैसा भी , जो भी हूँ ,
                  तेरे  आशीष से हूँ  !
                  तेरे बिन लगता  इस   जीवन में ,
                  सूखी  झील  सा हूँ !
                  कितना खाली  सा दिखता है ,
                  मेरे घर का हर एक कोना !
चर्चा होती ही तेरी बातों का ,
जुबान यह कपकपाई  !!    
 


                        



 

रविवार, 27 मार्च 2011

" प्रेम " की रेखा गणित

" प्रेम " की रेखा गणित


" प्रेम " दो विपरीत ध्रुवों पर स्थित .
दो बिन्दुओं से निर्मित .
रेखा नहीं है !
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समानांतर विचारों से युत
दो रेखाए भी नहीं !
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आपस में क्रास करती ,
 
एक दूजे का हृदय चीरती ,
रेखा तो कदापि नहीं !




" प्रेम " तो पवित्र मिलन है
तन मन व् आत्मा के तल का !
तीनो मिलकर
एक पवित्र त्रिकोण बनाते है !
संगम होता है तीनो का
वही सिर्फ वही " प्रेम " घटता है !
रेखाए समा लेती है
एक दूजे को सहज भाव से
फिर सीमा विहीन होकर
चल पड़ती है ..साथ साथ
विराम रहित अनन्त प्रेम पथ पर !

प्यार का सिम्बल भी तो ,
त्रिकोणीय है ,
और भी विशेष हो जाती है
जब झुक जाती है
एक दूजे के लिए
ले लेती है आकार
एक दिव्य हृदय का !




ईश्वरीय " प्रेम " भी तो
दो त्रिकोणों का समागम है
जहाँ शिव शिवा विलीन हो जाते है ,
एक दूजे में ,
अर्धनारेश्वर बनकर ,
यही तंत्र का दिव्य नृत्य है
यही " प्रेम " का रेखा गणित है !!


अनन्त चैतन्य
लखनऊ

शनिवार, 26 मार्च 2011

ढाई आखर 'प्रेम' का


ढाई आखर 'प्रेम' का 

'प्रेम' ढाई आखर का 
मात्र एक शब्द  नहीं
भावना जगत का यह
अंतरतम तल है !!

राधा की उपासना का 
मीरा की आराधना का
कबीरा की साधना का 
यही मूल  मंत्र है !!

बुद्ध की करुणा का 
महावीर की दया का 
ईशा की ऊर्जा का 
एक मात्र श्रोत है !!

चेतना में प्रज्ञा का 
भक्ति में श्रद्धा का 
ज्ञानियों में विद्या का 
आवश्यक तत्व है !!

मन से बुद्धि का 
ह्रदय से आत्मा का 
स्व से परमात्मा का 
सुन्दरतम सेतु है !!

सबरी की भक्ति का
हनुमत की शक्ति का 
भरत की तपस्या का 
दिव्यतम सूत्र है !!

माता की ममता का 
पुष्प की कोमलता का
गंगा की पवित्रता का 
उच्चतर रूप है  !!

सबसे सरल व्रत है यह 
प्रेम पथ मार्ग का 
प्रेम मात्र शब्द  नहीं 
मूल तत्व सत्य का !!
       
      अनंत चैतन्य 
          लखनऊ 





शुक्रवार, 25 मार्च 2011

सृजन !





सृजन 
( दिव्य ऊर्जा का एक नृत्य )

सृष्टी के सृजना ने
पुरुष पृकृति मैथुन से
सुन्दरतम रचना रची 
पूर्ण समग्रता  में !

नर नारी रूप था वह
ईश्वरीय दृष्टी में 
आगे की सृष्टी हेतु
आवश्यक तत्त्व था !

दोनों मिलेंगे जब
पूर्णता तभी संभव
ऊर्जा जगत में इसे
दो धुवीय  कहते है !

पञ्च तत्व मिलते जब 
अलग संरचना में 
नियम  यही मूल है 
इश्वरीय रचना में !

इडा और पिंगला  का 
अद्भुत संयोग है यह
कुण्डलिनी शक्ति का यह 
चैतन्य नृत्य है !

भैरवी और भैरव का 
अलौकिक सम्भोग है यह 
साधना का मंत्र और ,
यन्त्र तंत्र योग है !

शिव न मिले शिवा से 
तो शव बन जाते है
शिवा संग मिलते ही 
ब्रह्म कहलाते है  !

मुखौटे


मुखौटे 

उम्र  गलती  हुई !
शाम  ढलती  हुई !
डूबता  वक्त  है !
सुप्त  हुआ  रक्त  है !
मुखौटे चेहरे  पर  अब  भी ,  लगाये  बैठे  है !
दुकाने  झूठ की  सुन्दर ,     सजाये  बैठे  है  !

ये  नकली  मुस्कुराना !
फरेबों  से,  रिझाना  !
वफ़ा  और  प्यार  में ,
झूठे  व्यवहार  में !
जो  नगमे  दिल  को  छू  जाए ,बनाए  बैठे  है  !
बहुत  से  टुकडो  में  दिल  को ,सजाये  बैठे  है !   

चाहे  भगवान्  का,  घर  हो  !
चाहे  पैगम्बर  का , दर  हो  !
सौदा  कैसे   किया    जाता  ! 
बखूबी   इनको     है  आता  !
कुछ  फूल  माला  से  , उनको ,   रिझाए  बैठे  है   !
काम  करदो  मेरा  पहले , (फिर  भोग  दू ) शर्ते  लगाये  बैठे  है  !

सरल  बन जा , समय  है !
सत्यता  में ,  न  भय  है  !
हटादे       सब      मुखौटे !
मौलिकता  में,  आ  लौटे !
अभिनय  छोड़  दे      हम   , यह  नशीले  शौक  जैसे  है  !
अबसे  अब  वैसे  ही  जी ले  ,  मूलतः   में  हम  जैसे  है !


स्वामी  अनंत  चैतन्य 
लखनऊ 

मंगलवार, 22 मार्च 2011

अद्वैत क्या है ?

                                          अद्वैत क्या है ?


जैसे,
शाम की परछाईयाँ 
धीरे धीरे लुप्त होकर
समिट गयी हो 
अन्धकार के आगोश में 
और मिट गयी हो दूरियां !

जैसे,
फूलों का मकरंद
उसका रंग व् सुगंध 
बह कर घुल जाए 
शीतलता साथ लिए 
बहती बयार में !

जैसे,
माता के गर्भ में 
सोता हुआ बालक
जुडा हो तन जिसका 
अवचेतन मन जिसका
और उसकी आत्मा 
स्वांस खानपान धड़कन व् जीवन
सर्वस्व एक हो !

जैसे ,
प्रियतम की गोद में 
सुध बुध भुला कर
स्वयं को मिटा कर
तन मन और आत्मा से 
विलीन हुयी प्रेयसी
एकाकार प्रेममयी
मौन के शून्य में !

जैसे,
समाधी का योगी 
तिरोहित हुए मै में 
लुप्त हुआ व्यक्तित्व 
विलीन  हो गया हो 
निराकार निर्विकार 
अनंतमयी शून्य में !

जैसे ,
बादल से बिछुड़ी हुयी 
वर्षा की एक बूँद
गिर गयी हो 
किसी महा सागर में 
बन गयी हो 
वह सुमंद्र 
अपने को मिटा कर !!

- स्वामी अनंत चैतन्य 
    लखनऊ


 




शनिवार, 19 मार्च 2011

कलंकित चाँद

चौथ का चाँद

चाँद आया था ,
शाम को घर पर ,
दस्तक दिया ,
मै घर पर ही था किन्तु ,
मिला नहीं जान बूझ कर !!

सुबह से ही 
हिदायतें दी जा रही थी ,
नहीं मिलना है ,
याद दिलाया जा रहा था !
 क्या अजीब बात है 
एक दिन पहले की ही तो बात है
सारी दुनिया बेताब थी 
उसकी एक झलक पाने को 
असंख्य आँखे , अत्याधुनिक दूरबीने
कह रहे थे सभी 
छिपा है बादलों में ,
चाँद दिखता क्यों नहीं ?
बस एक बार हो दीदार ,
ताकि कल ईद हो , बांटे सब मिल प्यार !
पर आज कोई मिलना न चाहता था 
हलांकि कल सा ही सुन्दर 
और थोडा सा बड़ा था !
एक दिन में ही ऐसा क्या हुआ  ,
या उस रात कोई बड़ा गुनाह किया !


सोच रहा हूँ   !
यह दुनिया भी अजीब है
कभी हाथों हाथ लेती है ,
दिल में जगह देती है 
फिर अगले ही दिन
उठा कर गिरा देती है !!
कहते है , आज चौथ का चाँद है ,
कलंकित चाँद है 
देखोगे तो कलंक लगेगा ,
कलंक से सब डरते है ,
पर अन्दर ही अन्दर गुनाह करते है !!
भला इस चाँद का क्या दोष 
जो सुबह से ही रहे है  कोस !!

स्वामी अनंत चैतन्य 
( अनंत पथ का पथिक )
     लखनऊ