गुरुवार, 26 अगस्त 2010

साधना एक नदी की भांति


साधना एक नदी की भांति


साधना में हम किस पड़ाव पर चल रहे है यह मापने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए ! न ही इस बात की चिंता की अभी कौन सा चक्र जाग्रत है कौन सा नहीं ! मेरे विचार से न तो स्वयं इसका आकलन करना चाहिए न ही इस बारे में सदगुरु से पूछना चाहिए , हाँ अपने अनुभवों को इमानदारी से सदगुरु को बताना चाहिए , जिससे मार्ग दिशा मिल सके !

साधक को केवल अंतिम लक्ष्य महासागर में विलीन होने तक रखना चाहिए ! साधना रुपी नदी कब सीधी बहेगी , कहा गहराई , कहा उथली , कहा किस ओर मुड़ना है यह ध्यान देने की बात नहीं होनी चाहिए ..बस अविरल बहते ही रहना अंतिम लक्ष्य तक ! साधना में भी ऋतुओ के अनुसार कभी उफान , कभी धीमी गति , कभी विकराल तो कभी सौम्य दशाये आती है ..यह सब स्वाभाविक रूप है ..साधना अपना रास्ता खुद ही चुन लेगी बस सजगता से निहारते रहे !

हाँ यह जरूर होना चाहिए की गुरु की श्रधा , विश्वास रूपी दो छोरे के बंधन की सीमा रहे ..इससे गति मिलती है ..साधना के बहाव में !

साधना रुपी नदी को भी अनजान , अज्ञात , ऊबड़ , खाबड़ , वन , पर्वतों के बीच रास्तों से पार होना पड़ता है ! इस यात्रा में विश्राम नहीं है ..विश्राम हुवा नहीं की लक्ष्य भटका ...बस यह एक अकेले की यात्रा है ..गुरु के श्रधा विश्वास रुपी किनारे संभाल कर रखते हुए महासागर में पंहुचा देंगे ..बस सब अस्तित्व के सहारे छोड़ दे !

बस आवश्यकता है एक नदी बनने की ..लक्ष्य कठिन जरूर असम्भव नहीं !




प्रणाम

स्वामी अनन्त चैतन्य

लखनऊ

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