रविवार, 29 अगस्त 2010

भक्ति और ज्ञान

                          भक्ति और ज्ञान                                                                                                                                         

भगतिहि ग्यानीहि नहि कछु भेदा ! उभय हरहि भव संभव खेदा !!

                              हिन्दू दर्शन में दो ह़ी मार्ग इश्वर की प्राप्ति हेतु बताये गए है ! जिसमे से एक है भक्ति मार्ग दूसरा ज्ञान मार्ग ! दोनों का अंतिम लक्ष्य आत्मा का परमात्मा से मिलन है !

                             भक्ति मार्ग के प्रवर्तक देवर्षि नारद जी है तथा ज्ञान मार्ग भगवान् शिव और शिवा के बीच घटे अति आत्मीय संवाद ! ( और भी है पर मै यहाँ प्रमुख रूप से दो को ह़ी ले रहा हूँ )
देवर्षि नारद ने भक्ति के सारे सूत्र भगवान् विष्णु , माँ पार्वती , पितामह के माध्यम से प्राप्त कर , भगवान् व्यास , सूत , शौनिक आदि ८८००० ऋषियों के माध्यम से पुराणों , कथाओं के द्वारा पृथ्वी लोक में पहुचाये ! उद्धरण के तौर पर , सत्य नारायण ब्रत , एकादशी व्रत ,पूर्णिमा . प्रदोष आदि आदि ! भक्ति मार्ग के सूत्र महर्षि नारद एवम भगवान् नारायण के मध्य सेवक स्वामी ( पिता -पुत्र ) में हुए अतिरेक प्रेम संबंधो से उपलब्ध हुए !

                              ज्ञान मार्ग ( ध्यान , योग , तंत्र , मंत्र , यन्त्र आदि ) के सारे सूत्र जगदम्बा माँ और भगवान् शिव के बीच गुरु शिष्य संबंधों द्वारा अतिरेक करुना , प्रेम के माध्यम से गुरु परंपरा के माध्यम से जन मानस को प्राप्त हुए !


                              दोनों ह़ी मार्गो के सूत्रों को प्राप्ति का माध्यम अतिशय प्रेम , अतिरेक में करुणा तथा जन हित का भाव ह़ी था !

                             वस्तुतः भक्ति मार्ग को जितना सरल समझा जाता है उतना है नही ! एक मायने में बहुत सरल किन्तु व्यवहारिक दृष्टि कोण से यह सर्वाधिक कठिन मार्ग है ! इसमें बस एक ह़ी छलांग लगानी होती है वह है भाव जगत से भगवान् की ओर ..और दूसरा कोई step नही ! द्वेतभाव भाव से अद्वेत में पहुच जाना ! भक्त को पत्थर ( जड़ ) में जब भगवान् ( पूर्ण चेतना ) देखना शुरू करता है तभी समझो यात्रा प्रारंभ हुई ! जब भक्त को ..." सीय राम मय सब जग जानि " का अनुभव होने लगे ..और सारे साधन ( पुष्प , दीप , नैवेद्य आदि ) दूर हो जाए ..क्यों की साधन अब उसे ईश दिखने लगे ..समझो छलांग लग गयी !

                             भक्त या तो परमहंस के भाव दशा में होगा या विछिप्त ..बीच की कोई स्थिति नही है ! केवल क्रिया से भक्त नही हो सकता ..! जो व्यक्ति अपने ह़ी घर से सदस्यों ( चेतन ) से प्रेम नही कर सकता वह उस जड़ मूर्ति से कैसे प्रेम करेगा ..तात्पर्य यह की अभी उसकी भक्ति छलावा है ! भक्ति भाव की उच्च दशा है अभ्यास नही ! भक्ति मार्ग में भक्त को नही जाना होता भगवान् खुद चलकर आते है , जबकि ज्ञान में साधना के माध्यम से परम सत्ता तक पहुचना होता है !


                             भक्ति की बात हो और मीरा का , शबरी का नाम न आये ..कैसे हो सकता है ! इनको हम सम्पूर्ण भक्त कहेगे ! मीरा तो सशरीर द्वारिकाधीश में समा गयी , अद्वेत घट गया !


सोह्मिस्म इति वृत्त अखंडा ! दीप शिखा सोई परम प्रचंडा !!

परम प्रकाश रूप दिन राती ! नहि कछु चाहिय दिया घृत बाती !!

                            ग्यान मार्ग क्रम बद्ध ( step by step ) साधनात्मक क्रियायों द्वारा इस्वर तक पंहुचा जाता है ! गुरु यहाँ मात्र गुरु न होकर इश्वर का रूप होता है ! शिष्य को एक एक सीढ़ी चढाने की प्रक्रिया बताते है ! सद गुरु के प्रति समर्पण श्रद्धा विश्वास से साधक हल्का होता जाता है ! सदगुरु कभी कभी शक्तिपात के माध्यम से शिष्य को उपर खींच लेता है !


                           अस्तु , जो जिस को सरल लगे अपना ले !



  सदगुरु कृपा केवलम..








प्रणाम
अनन्त पथ का पथिक
स्वामी अनन्त चैतन्य
लखनऊ

1 टिप्पणी:

  1. ''जब भक्ति प्रेम मार्गी हो तो आत्मज्ञान के मार्ग स्वत: खुलते जाते हैं...............ज्ञान के द्वारा स्व का परिचय संभव है परन्तु स्व की प्राप्ति प्रेम बिना संभव नहीं "

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