बुधवार, 28 जुलाई 2010

सुनना मौन में ही संभव है !

श्री गणेशाय नमः
श्री सद गुरुवे नमः
सद गुरु श्रदेय श्री कुणाल कृष्ण
( सम्बुद्द रहस्यदर्शी एवम संस्थापक अनंत पथ )



सुनने की कला




सुनना मौन में ही संभव है !

पूरी तरह विश्रांत होकर सुने !

पूरी तरह सजग होकर सुने !

अपने आतंरिक वार्तालाप को तोड़ दे ,

और तुलना रहित होकर सुने !

सहमति और असहमति को गिराकर ,

निरुद्देस्य होकर सुने !

ऐसे सुने जैसे पहली बार सुन रहे हो !

सुनते हुए केवल सुने , अपने भीतर

कोई व्याख्या या विश्लेषण न उठने दे !

कान पर पड़ती चोट तुम्हारी आँख खोल देगी !

शब्दों को सुने और शब्दों के पार देखे !

श्रोता से दृष्टा तक की यात्रा !

सुनने की कला आते ही उत्पन्न होती है

देखने की कुशलता !

सुनना तभी पूरा होता है जब तुम उसे भी

अनुभव करते हो जो सुन रहा है !

सम्यक श्रवण साक्षी भव में ले जाता है !

( सदगुरु श्रद्धेय श्री कुणाल कृष्ण द्वारा रचित अनंत पथ के मित्र से संगृहीत रचना )

 
संग्रह कर्ता
अनंत पथ का एक पथिक
स्वामी अनंत चैतन्य
लखनऊ

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